जहाँ रिश्ते होते हैं वहाँ हक़ और फर्ज़ साथ-साथ चलते हैं, वरना सिर्फ हक़, अधिकार तो कोर्ट कचहरी के मुद्दे हैं, वहाँ रिश्तों का कोई काम नही।
जहाँ रिश्ते होते हैं वहाँ हक़ और फर्ज़ साथ-साथ चलते हैं, वरना सिर्फ हक़, अधिकार तो कोर्ट कचहरी के मुद्दे हैं, वहाँ रिश्तों का कोई काम नही।